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रजस्वला स्त्री के सम्बन्ध में हिन्दू धर्म में मान्यता और विधान जो की सत्य है

रजस्वला स्त्री के सम्बन्ध में हिन्दू धर्म में मान्यता और विधान जो की सत्य है

रजस्वला स्त्री के सम्बन्ध में हिन्दू धर्म में मान्यता और विधान जो की सत्य है :
सन्दर्भ :गरुड़ पुराण अध्याय १५ श्लोक ७-२२ में उल्लेखित

स्त्रियों के ऋतुकाल   में चार दिन तक उनका त्याग कर देना चहिये उतने समय तक उनका मुख भी न देखें क्योंकि उनके शारीर में पाप का निवास होता है.
चौथे दिन वस्त्र सहित स्नान करने से स्त्री शुद्ध हो जाती है परन्तु पितरों एवं देवों की पूजा सात दिन के बाद ही करना चहिये एवं व्रत करना योग्य है
अब जो व्यक्ति अपने संतान की इच्छा रखते हैं की पुत्र या पुत्री हो अच्छे सगुन संपन्न हो उनके सन्दर्भ में यहाँ उनका समाधान है सप्ताह के मध्य में जो गर्भधारण होता है उससे मलिन संतान का जन्म होता है
(सुश्रुत संहिता के अनुसार रजस्वला स्त्री के प्रथम एवं दुसरे दिन में गर्भाधान होने पर संतान प्रसवकाल या प्रसुतिग्रिः में ही मर जाती है ,तीसरे दिन गर्भाधान होने से पुत्र अंगहीन एवं अल्पायु होता है / चौथे दिन गर्भाधान से पुत्र विद्याहीन,अल्पायु,दरिद्र,एवं परस्त्रीगामी  होता है )
प्रायः सात दिन के बाद ही गर्भाधान से पुत्र की उत्पत्ति होती है और विषम रात्रियों में गर्भाधान से पुत्री की उत्पत्ति होती है १४ वींरात्रि को गर्भाधान होने पुत्र धार्मिक भाग्यवान गुणवान होता है जो हर मनुष्य के लिए संभव नहीं है
स्त्री के रजोदर्शन से १६ रात्रि तक का काल ऋतुकाल कहा गया है ५ वे दिन स्त्री को मधुर भोजन करना चहिये कडुवा तीखा खरा उष्ण भोजन नहीं करना चहिये ताकि गर्भाशय ओषधि का पात्र बने. संवास करते वक़्त पुरुष और स्त्री दोनों का मन धार्मिक भाव में हो तो योग्य हो सकता है


टिपण्णी :डॉक्टर या साइंस की सलाह भी अक्सर यही होती है लेकिन हम गलती करते हैं कुछ लोग शंका में होते हैं क्योंकि अक्सर लोग सुनी सुनायी बातों से ही जानते हैं लेकिन मैं याहन आपको जो बता रहा हूँ हमारे धर्म के पुस्तको में कई सालो पहले ही उल्लेखित है और मेरा स्वाभाव बिना समक्ष देखे या किसी तर्क के वो विचार नहीं मानता इसलिए जो लोग अभी भी शंका में है तो उनके लिए सत्य है और ये कहाँ से उल्लेखित है उसका भी परिचय इस लेख में है वो पुन: अपनी शंका को नष्ट करने के लिए पढ़ सकते हैं
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